यादों का सिलसिला
(बचपन में अक्सर कहानिया शुरू होती ... एक था लकडहारा, रोज़ाना जंगल से लकड़ी काट कर लाता, उसे बेच किसी तरह गुज़र बसर करता...)
तिलमिला गया थो वो
कुल्हाड़ी की चोट से
"कमज़र्फ रहम कर
बूढ़ा दरख्त हूँ थोड़ी तो शर्म कर?"
ख़ामोश था नज़ारा
एक था वो लकड़हारा
गर्दिश में दिन थे उसके,
लम्बी सियाह रातें
रफ्ता रफ्ता फिर भी
गुज़रता था वक़्त सारा
आखिर तो था बस उसको
मेहनत का इक सहारा
"मुआफी हो मुझ को बाबा,
क्या दर्द है ज़ियादा?
बयाँ फिर भी कर दो लेकिन
क्या जुर्म है हमारा?
करता हूँ चोट जिस पर
सड़ गल रहीं थी शाखें
इस के बग़ैर वरना
तय था तेरा उजड़ना
ग़र जुर्म है यह तुझ पर
सद -लानतें हों मुझ पर
भाई मगर समझ ले
मेरा वक़्त हो चला है
अब दौर मशीनों का
आने को मुंतज़र है
अब दौर मशीनों का
आने को मुंतज़र है
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