बुधवार, 1 अगस्त 2012

लकड़हारा



यादों का सिलसिला 
(बचपन में अक्सर कहानिया शुरू होती ... एक था लकडहारा, रोज़ाना जंगल से लकड़ी काट कर लाता, उसे बेच किसी तरह गुज़र बसर करता...)

तिलमिला गया थो वो
कुल्हाड़ी की चोट से 
"कमज़र्फ रहम कर
बूढ़ा दरख्त हूँ थोड़ी तो शर्म कर?"
ख़ामोश था नज़ारा
एक  था  वो  लकड़हारा 
गर्दिश में  दिन  थे  उसके, 
लम्बी  सियाह  रातें 
रफ्ता  रफ्ता  फिर  भी 
गुज़रता  था  वक़्त  सारा 
आखिर  तो  था  बस  उसको 
मेहनत का  इक  सहारा 
"मुआफी हो मुझ को  बाबा,
क्या  दर्द  है  ज़ियादा?
बयाँ  फिर  भी  कर  दो  लेकिन 
क्या  जुर्म  है  हमारा?
करता हूँ  चोट  जिस  पर 
सड़ गल  रहीं  थी  शाखें 
इस  के  बग़ैर वरना 
तय था  तेरा  उजड़ना 
ग़र जुर्म  है  यह  तुझ  पर 
सद -लानतें  हों  मुझ  पर 
भाई  मगर  समझ  ले 
मेरा वक़्त  हो  चला  है 
अब  दौर  मशीनों का 
आने  को  मुंतज़र है 
अब  दौर  मशीनों का 
आने  को  मुंतज़र है 



शनिवार, 28 जुलाई 2012

रीछ से कैसे बचें ?


सर्दियाँ आते ही रीछ हमारे इलाक़े में आ जाते हैं. वजह सीधी सी है, ऊंचाइयों पर हिमपात होने से रीछ का अपना इलाक़ा रहने लायक़ नहीं रह जाता, खाने की तलाश में में ये जानवर निचले इलाकों में आ जाते हैं और जंगलों में पनाह ले लेते हैं. चूंके इन इलाक़ों के बाशिंदे रीछ के तौर तरीक़ों से नावाकिफ़ होते हैं लिहाज़ा इनसे सामना होने पर अक्सर ही ज़ख़्मी हो जाते हैं कभी कभी तो मौत भी हो जाती है. रीछ  से निपटने के कुछ आसान तरीक़े हैं जिन्हें ज़हन में रखा जाए तो रीछ से सामना होने पर कुछ मदद हो सकती है...
१. अगर रीछ दिखाई पड़ जाए तो अपनी जगह बिना हिलेडुले खड़े रहें फिर अहिस्ता अहिस्ता बिना मुड़े ही पीछे पीछे होते जाएँ.ऐसा करने से रीछ आश्वस्त हो जायेगा और अपने राह निकल जाएगा. दौड़े कभी नहीं ऐसा करने से उसकी शिकार-प्रवृति उभर आएगी और रीछ किसी भी इंसान से दो गुना तेज़ दौड़ सकता है.
२. अगर जंगल से गुज़र रहे हैं तो खाने का सामान न लेकर चलें. रीछ किलोमीटर दूर से ही खाने की गंध भांप लेता है. कहावत हैं अगर चीड का फल गिरा तो, हिरण ने उसे सुन लिया, चील ने देख लिया और रीछ ने सूँघ लिया.
३.मादा रीछ बच्चों के साथ बेहद आक्रामक होती है. जंगल से गुज़र ते वक़्त जोरों से शोर करते हुए जाएँ ताके अगर कोई रीछ वहाँ हो तो वह चौंके नहीं. रीछ को हतप्रभ होना बिलकुल भी पसंद नहीं.

सबसे बड़ी बात तो ये है के रीछ से सामना ही न हो.

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

प्रेतों की दास्तान - 2



ये वाक़िया सन सत्तर के क़रीब का है उस वक़्त आम  इन्तिख़ाब होने वाले थे; सरकारी मुलाज़िम अफ़रा तफ़री में थे, बेइन्तेहा मसरूफ़ थे. जिन शख्स ने ये वाक़िया बयान किया है वे साहिब वजूद में भी नहीं आये थे. ये वाक़िया उनके वालिद से सरोकार रखता है. वालिद सरकारी मुलाज़िम थे, पटना शहर में गंगा नदी से कुछ ही दूर इनका घर था. उस रोज़ रात के वक़्त इनके वालिद साहिब को सरकारी वजाहत से कहीं जाना था, जीप का इंतज़ाम किया गया था. कोई रात के ग्यारह बजे होंगे, जीप आने में देर हो गयी. जहां जाना था वह जगह कोई बहुत दूर नहीं थी सो इन्होने तय किया के सायकल से हे चले जाएँ. फिर वे सायकल निकाल गंगा के किनारे किनारे अपनी मंज़िल-ए-मक्सूद की जानिब निकल पड़े. कुछ रास्ता तय करने पर इन्हें एक सनसनीखेज़ मंज़र पेश आया. वे देखते हैं के उनसे कुछ आगे एक मोहतरमा सफ़ेद साड़ी पहने रात की तन्हाई में ख़रामा ख़रामा नदी के किनारे किनारे बढ़ी चली जा रही हैं. पहले तो वह हैरान रह गए, रात के वक़्त सुनसान राह एक अकेली औरत क्या कर रही है? फिर उन्हें ख़याल आया के कहीं ये औरत ख़ुदकुशी को तो नहीं अंज़ाम देने के इरादे से निकली है! उन्होंने उस औरत को आवाज़ दे कर रोकना चाहा लेकिन उस औरत ने उनकी सदा को सिरे से नज़र अंदाज़ कर दिया. इस बात से उनका यकीन और भी पुख्ता हो गया के ज़रूर ये खातून ख़ुदकुशी के इरादे से निकली है. फ़ौरन ही उनहोंने अपनी रफ़्तार में इज़ाफा कर दिया साथ साथ उसे रुकने के लिए भी कहते रहे . हैरत तो इस बात के थी के वह रह रह कर पीछे देखती के जनाब इनके पीछे आ रहे हैं के नहीं लेकिन इसके बावजूद उन दोनों के दरमियान फासला कम ही नहीं हो रहा था. उन्होंने ने अपनी रफ़्तार और तेज़ कर दी लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ. 
     फिर वह ख़ातून घाट पर उतर गयी, ये साहिब भी अपनी सायकल ज़मीन पर छोड़ उसके पीछे पीछे दौड़ पड़े. वह औरत थी के रुकने का नाम ही नहीं ले रही थे, मुड़ मुड़ कर पीछे भी देखती जाती. जब वह पानी में उतर गए तो उन्हें किसी ने ज़ोरों से झिंझोड़ा. वह उनकी जीप का ड्राईवर था. वे इस वक़्त क़रीब कमर तक पानी में डूब चुके थे. कह रहा था, मैं कब से आप को चीख चीख कर पुकार रहा हूँ लेकिन आप तो अपनी धुन में बढ़ते ही जा रहे थे. जब उन्होंने उस औरत का ज़िक्र किया तो वह हैरत से बोला, मुझे तो इस बियाबान में आप की सिवा कोई भी और नज़र नहीं आया. इस बात में रत्ती भर शक़ नहीं के अगर वह कुछ और देर कर देता तो यक़ीनन ही बहुत देर हो जाती. आज तक इनका कुनबा उस ड्राईवर का शुक्रगुज़ार है और उसे अपने परिवार का ही हिस्सा  मनता  है.

बुधवार, 25 जुलाई 2012

प्रेतों की दास्तान - १



ये वाक़िया दरअसल बडोल गाँव का नहीं है बल्के हिमाचल के किसी गाँव का है. हुआ यूँ के अभी कुछ रोज़ क़बल मुझे पुणे जाने का मौक़ा मिला, वजह सैर सपाटा ही था. पुणे में एक मोहतरमा ने ये क़िस्सा बयान किया था , जो के मैं verbatim पेश कर रहा हूँ. बात काफ़ी पुरानी है जब ये मोहतरमा एक छोटी सी बच्ची थी. इनके घर में इनसे भी छोटा भाई और मां ही थी. एक रोज़ भाई अजीब से हरकत करने लगा. वह न तो कुछ खा रहा था और न ही कुछ बोल रहा था बस एक ही जगह बुत सा बैठा था. काफ़ी कोशिश के बावजूद उसके बर्ताव में कोई भी बदलाव नहीं आया. परेशान मां मिन्नत करती रही लेकिन बंदा था के टस से मस नहीं हो रहा था. आखिर मां ने आपा खो दिया और डांटने लगी तो  लड़का यकायक ही खड़ा हो गया और अजीब आवाज़ें निकालने लगा. फिर वह किसी अनजानी आवाज़ में कुछ कहने लगा जो के कोई भी समझ नहीं पा रहा था. साफ़ दिखाई पद रहा था के लड़का किसी प्रेत के साए में पड़ गया है. माँ-बेटी हैरान परेशान सी सोच में थी के आखिर क्या किया जाए. एक पडोसी ने कहा के पास के गाँव में कोई जोगी है जो इस का इलाज़ कर सकता है. मां जोगी की चौखट पहुँच गयी, उसके वहाँ पहुँचते ही जोगी कह उठा, 'तो तुम आ ही गयी?' वह हैरान रह गयी.
जोगी उनके घर पहुंचा और लड़के से जाने क्या गुफ़्तगू  करने लगा. कुछ वक़्त बाद  वह कहने लगा. इस लड़के पर एक आठ बरस की छोटी लड़की का साया है. उस लड़की को उसकी मां ने ही क़त्ल कर दिया था. कल इस लड़के ने उस जगह जहां लड़की को क़त्ल कर दफना दिया गया था, थूक दिया था जिस वजह से उस रूह ने नाराज़ हो इस अपने बस में कर लिया है. अब तो उस लड़की का ठीक से दाह संस्कार कर उस जगह शुद्ध करना होगा. फिर उन लोगों वैसा ही किया. इसके कुछ रोज़ बाद ही लड़का अहिस्ता अहिस्ता अपनी पहले वाली हालत में आ गया.


गुरुवार, 19 जुलाई 2012

चंडाखाल का एक दिलचस्प वाकिया


गढ़वाल में खाल प्रत्यय प्रायः जगहों के नाम पर लगता है मसलन चंडाखाल, गुमखाल, पौखाल, कांडाखाल नालीखाल इत्यादि. अगर आप किसी गढ़वाली से पूछें के भला खाल क्या चीज़ है तो जितने मुंह उतनी बातें वाला मुहावरा सार्थक हो जाता है. खाल मेरे ख़याल से हिंदी में प्रयोग में लाने वाले शब्द दर्रा का ही पर्यायवाची है यानी दो पहाड़ों के बीच से निकलने का रास्ता. बडोलगाँव भूगोलीय परिदृश्य में भी एक खाल है, चंडाखाल.  कई वर्ष क़बल जब मोटरों द्वारा आवाजाही का चलन न था लोगबाग पैदल ही सफ़र करते थे और जो कमज़ोर अथवा अपाहिज थे वे टट्टू पर सवारी कर काम चलाते थे. दुगड्डा उस वक़्त एक बड़ा व्यापार का केंद्र था. कहते हैं रोज़ाना पचास टट्टू साज़ो सामान से लैस  हर सू निकल पड़ते थे दूर दराज़ के इलाक़ों की ज़रूरत की आपूर्ति करते थे. उस वक़्त दूगड्डा की चहल पहल  देखते ही बनती थी. चंडाखाल भी दुगड्डा से बडोल गाँव आने जाने का सुलभ मार्ग मुहय्या करता था. 
                  जैसा के पहले भी अर्ज़ कर चूका हूँ चंडाखाल की ऊंचाई पर कभी हमारी दुकान हुआ करती थी. मान्यवर दिवाकर के अनुसार किस जजमान ने के. डी. साहब को दक्षिणा स्वरुप अर्पित की थी. वह दूकान तो अब एक अरसे से नहीं है, अब वह रास्ता भी कम ही इस्तेमाल में आता है. एक बार का वाक़िया मुझे याद है, मैं, सर प्रभाकर, आनंद, मीनाक्षी और लक्ष्मी चंडाखाल हो कर बडोल गाँव आ रहे थे. चंडाखाल की चढ़ाई पर अच्छाखासा जंगल है. हम हँसते खेलते जंगल पार कर गाँव पहुँच गए, इस बात से क़तई बेख़बर के जंगल में रीछ हैं. अगर इस बात का ज़रा भी इल्म होता तो यक़ीनन निक्कर में अगर टट्टी नहीं तो पेशाब ज़रूर निकल आता. उस रात कुत्ता रात भर भोंकता रहा सुबह ताई जी ने बताया के भालू आया था. बाहर हर तरफ उसके उत्पात के निशान मौज़ूद थे -- सब्जियों के पौधे उखाड़े हुवे, आधे कद्दू खा कर फेंके हुए वैगैरह. गाँव में घर में शौचालय का चलन  नहीं था लिहाज़ा आज़ाद हो किसी भी अनुकूल जगह पर आप  संडास कर सकते थे. उस रोज़ मैंने कूल के आगे जा कर एक एकांत जगह चुनी और ज़मीन पर उकडूं बैठ हगने लगा. अचानक ही लगा के बिच्छु ने पूठी में डंक मार दिया हो. 
"मुर्दा मरल त्यार!' कह मैं उठ खड़ा हुआ, बिच्छु कहीं नहीं था हाँ कंडाली ज़रूर थी........

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

बडोल गाँव का इतिहास


 चरक जैसा के आप जानते हैं एक ऋषिवर थे, औसधी  विशेषज्ञ थे. 'चरक की डांड' नाम कैसे पड़ा इसकी भी एक रहस्यमयी दास्ताँ है.  अनेक वर्ष पूर्व जब बड़ोल गाँव  का नामो -निशाँ न था इस भू-भाग पर जंगली जानवरों का वर्चस्व था. बाघ स्वछंद घूमते थे, भालू, हिरन और तरह तरह के जानवरों का बोल बाला था. यह इलाक़ा इस लिहाज़ से ऋषियों की तपस्या के लिए सर्वथा उपयुक्त था, चूंके ऋषि-मुनियों को जानवरों का भय नहीं होता वह तो इंसान के अतिक्रमण से भयभीत रहते हैं. अपने तप की ज़ोर पर ऋषिवर जानवरों को आसानी से शांत कर सकते हैं लेकिन साधारण मनुष्य कुछ और ही चीज़ है, वह तो ऋषियों के पीछे ही पड़ जाता है और एक तपस्वी को यह बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं. मुनिवर चरक भी यहीं आसन जमा बैठे, घोर तपस्या के दौरान जड़ी बूटियों का अध्यन भी होता रहता था. एक एक कर अनेक जानवर भी वहाँ आस पास ही विचरण करने लगे. वनस्पति भक्षक और मांस भक्षक सभी बिना किसी भेद भाव के वहाँ शांत भाव से आते जाते थे. ऋषिवर सभी जानवरों को जल मुहय्या करते , जख्मियों को जड़ी बूटी का लेप लगाते और अन्य सेवा सुश्रुषा का उपाय करते. एक भालू विशेषरूप से वहां मधु की इच्छा से आता था. मुनिवर का वह प्रिय था यथा उसे उन्होंने नाम भी दिया था 'बिल्लू'. आश्रम में मधुमक्खियों के अनेक छत्ते थे. बिल्लू गाहे-बगाहे शहद का आनंद लेता रहता था.


        एक रोज़ ऋषिवर गहन ध्यान में मग्न  थे, पशुओं को अनायास ही इस बात का आभास हो गया था. वे सभी हर तरह से इस प्रयास में थे के कोई भी ऐसा  प्रकरण न बने के ऋषिवर का ध्यान भंग हो. बिल्लू को भी इस बात का आभास था लेकिन अपनी चंचल प्रकृति से विवस हो वह एक शहद के छत्ते पर टूट पड़ा. उस रोज़ क़िस्मत साथ न थी, मधु मक्खियाँ भड़क उठी जो भी पास नज़र आया उस पर टूट पड़ी. अफ़सोस चरक मुनि वहीं ध्यानमग्न थे, मधुमक्खियों के डंक से ध्यान टूट गया. पहली नज़र में जो दृश्य नज़र आया; बिल्लू भाग रहा था मधि मक्खियाँ उसके पीछे लगी थी. मुनिवर क्रोध में उठे अपना दंड उठाया और बिल्लू के पीछे दौड़ पड़े.  बिल्लू तेज़ी से पर्वत शिखर से नीचे की और दौड़ा तलहटी पर गदन पार कर सामने वाले शिखर पर चढ़ने लगा लेकिन वहीं मुनिवर ने उसे धर दबोचा. दे दना दना दंड का प्रहार कर उसे अधमरा कर दिया. मुनिवर का क्रोध शांत हुआ तो दंड वहीं पटक वापस अपने आश्रम चले गए. इस स्थान पर ऋषिवर भदोह का निवास था, जब उन्होंने ज़ख़्मी बिल्लू को देखा तो उस की मरहम पट्टी कर दी. शीघ्र ही बिल्लू स्वस्थ हो गया और वहीं रहने लगा. कालांतर में वह स्थान बडोल गाँव नाम से प्रसिद्ध हुआ और वह शिखर जहां मुनिवर चरक का आश्रम था 'चरक की डांड' के नाम से जाना जाने लगा. बडोल गाँव के पहले निवासी  बडोला कहलाये , लेकिन दुष्ट काला समुदाय ने दुर्गा दत्त काला की अगवाई में  बडोलाओं को वहाँ से खदेड़ दिया. शांत स्वभाव के बडोलाजन  चरक मुनि द्वारा छोड़ा हुआ पवित्र 'दंड' लेकर अन्य स्थान को रवाना हो गए और मौज़ूदा  'डूंगा' गाँव में आश्रय लिया. 'डूंगा' नाम दरअसल चरक के 'दंड' पर ही आधारित है.  

शनिवार, 7 जुलाई 2012

गढ़वाल की वनस्पति ....................


निचले हिस्सों में तो सभी मैदानी पेड़ पौधे मिल जायेंगे मसलन आम इमली अमरुद नीम वैगेरह लेकिन जिन्हें हम ख़ास तौर पर पहाड़ी वनस्पति कहेंगे वह थोडा ऊंचाई पर उपलब्ध होंगी. सबसे  व्यापक तौर पर जो वृक्ष मिलता है वह निसंदेह चीड़ है. तकरीबन पहाड़ों की निचली ऊंचाई से शुरू होकर ६-७००० फीट तक चीड़ का बोलबाला है. यह पेड़ अन्य वृक्षों के मुक़ाबले तीव्र गति से बढ़ता है. इसे पानी की अधिक मात्र दरकार है लिहाज़ा पर्यावरण के लिया इसकी अधिकता सर्वथा अनुकूल नहीं है. दूसरी समस्या इसका अत्यधिक ज्वलनशील होना है. पलक झपकते ही जंगल के जंगल स्वाह हो जाते हैं. एक वक़्त था जब चीड़ इतनी बहुतायत से नहीं मिलते थे, इनसे अधिक 'साल' के जंगल थे लेकिन मनुष्य की लालच के आगे इनकी एक नहीं चली; जलावन, निर्माण और घरेलु साज़-ओ-सामान की ज़रूरत के आगे जंगलों को अनाप सनाप काट दिया गया और इन वृक्षों की जगह चीड़ ने ले ली.
     
५००० से अधिक ऊंचाई पर देवदार का राज है. यह अद्भुद वृक्ष अपनी असमान को छूती ऊंचाई, नुकीले पत्तों का पिरामिड की तरह झुकाव के कारण बर्फीले वातावरण के सर्वथा अनुकूल हैं. लैंसडाउन से कुछ दूर तारकेश्वर एक ऎसी जगह है जहां कम ऊंचाई पर भी देवदार व्यापक तौर पर मिलते हैं. यह भी प्रकृति का अजूबा है के तारकेश्वर मंदिर के आसपास छोड कर देवदार वहाँ और कहीं भी नहीं हैं.     


इन वृक्षों के आलावा अन्य वृक्ष जो गढ़वाल में मिलते है वे हैं बलूत (oak), भोज (Birch), हल्दू, सदाबहार (Yew), शाहबलूत(Horse-Chestnut), गूलर(Cycamore), Willow , Alder इत्यादि. इन वृक्षों के अतिरिक्त तरह तरह की जड़ी बूटीयां मसलन ब्राह्मी , अश्वागंधी वैगेरह भी बहुतायत से मिलती हैं. फलों के वृक्षों का ज़िक्र किये बिना तो यह लेख अधुरा ही रहेगा, फलों में अंजीर (Fig), का-फल, बेडू, शहतूत(Mulberry), किन्गोड़ा, रसभरी(raspberry), जामुन,मुनक्का( Currants), पिंगल फल (Hazelnut), सेब, नाशपाती, चेरी, खुबानी (Apricots), Plums, Peaches, नारंगी, निम्बू, केला , अनार  और अखरोट वैगेरह ............


इन वृक्षों के चित्र जल्द ही पेश किये जायेंगे.