चरक जैसा के आप जानते हैं एक ऋषिवर थे, औसधी विशेषज्ञ थे. 'चरक की डांड' नाम कैसे पड़ा इसकी भी एक रहस्यमयी दास्ताँ है. अनेक वर्ष पूर्व जब बड़ोल गाँव का नामो -निशाँ न था इस भू-भाग पर जंगली जानवरों का वर्चस्व था. बाघ स्वछंद घूमते थे, भालू, हिरन और तरह तरह के जानवरों का बोल बाला था. यह इलाक़ा इस लिहाज़ से ऋषियों की तपस्या के लिए सर्वथा उपयुक्त था, चूंके ऋषि-मुनियों को जानवरों का भय नहीं होता वह तो इंसान के अतिक्रमण से भयभीत रहते हैं. अपने तप की ज़ोर पर ऋषिवर जानवरों को आसानी से शांत कर सकते हैं लेकिन साधारण मनुष्य कुछ और ही चीज़ है, वह तो ऋषियों के पीछे ही पड़ जाता है और एक तपस्वी को यह बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं. मुनिवर चरक भी यहीं आसन जमा बैठे, घोर तपस्या के दौरान जड़ी बूटियों का अध्यन भी होता रहता था. एक एक कर अनेक जानवर भी वहाँ आस पास ही विचरण करने लगे. वनस्पति भक्षक और मांस भक्षक सभी बिना किसी भेद भाव के वहाँ शांत भाव से आते जाते थे. ऋषिवर सभी जानवरों को जल मुहय्या करते , जख्मियों को जड़ी बूटी का लेप लगाते और अन्य सेवा सुश्रुषा का उपाय करते. एक भालू विशेषरूप से वहां मधु की इच्छा से आता था. मुनिवर का वह प्रिय था यथा उसे उन्होंने नाम भी दिया था 'बिल्लू'. आश्रम में मधुमक्खियों के अनेक छत्ते थे. बिल्लू गाहे-बगाहे शहद का आनंद लेता रहता था.
एक रोज़ ऋषिवर गहन ध्यान में मग्न थे, पशुओं को अनायास ही इस बात का आभास हो गया था. वे सभी हर तरह से इस प्रयास में थे के कोई भी ऐसा प्रकरण न बने के ऋषिवर का ध्यान भंग हो. बिल्लू को भी इस बात का आभास था लेकिन अपनी चंचल प्रकृति से विवस हो वह एक शहद के छत्ते पर टूट पड़ा. उस रोज़ क़िस्मत साथ न थी, मधु मक्खियाँ भड़क उठी जो भी पास नज़र आया उस पर टूट पड़ी. अफ़सोस चरक मुनि वहीं ध्यानमग्न थे, मधुमक्खियों के डंक से ध्यान टूट गया. पहली नज़र में जो दृश्य नज़र आया; बिल्लू भाग रहा था मधि मक्खियाँ उसके पीछे लगी थी. मुनिवर क्रोध में उठे अपना दंड उठाया और बिल्लू के पीछे दौड़ पड़े. बिल्लू तेज़ी से पर्वत शिखर से नीचे की और दौड़ा तलहटी पर गदन पार कर सामने वाले शिखर पर चढ़ने लगा लेकिन वहीं मुनिवर ने उसे धर दबोचा. दे दना दना दंड का प्रहार कर उसे अधमरा कर दिया. मुनिवर का क्रोध शांत हुआ तो दंड वहीं पटक वापस अपने आश्रम चले गए. इस स्थान पर ऋषिवर भदोह का निवास था, जब उन्होंने ज़ख़्मी बिल्लू को देखा तो उस की मरहम पट्टी कर दी. शीघ्र ही बिल्लू स्वस्थ हो गया और वहीं रहने लगा. कालांतर में वह स्थान बडोल गाँव नाम से प्रसिद्ध हुआ और वह शिखर जहां मुनिवर चरक का आश्रम था 'चरक की डांड' के नाम से जाना जाने लगा. बडोल गाँव के पहले निवासी बडोला कहलाये , लेकिन दुष्ट काला समुदाय ने दुर्गा दत्त काला की अगवाई में बडोलाओं को वहाँ से खदेड़ दिया. शांत स्वभाव के बडोलाजन चरक मुनि द्वारा छोड़ा हुआ पवित्र 'दंड' लेकर अन्य स्थान को रवाना हो गए और मौज़ूदा 'डूंगा' गाँव में आश्रय लिया. 'डूंगा' नाम दरअसल चरक के 'दंड' पर ही आधारित है.
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