गुरुवार, 19 जुलाई 2012

चंडाखाल का एक दिलचस्प वाकिया


गढ़वाल में खाल प्रत्यय प्रायः जगहों के नाम पर लगता है मसलन चंडाखाल, गुमखाल, पौखाल, कांडाखाल नालीखाल इत्यादि. अगर आप किसी गढ़वाली से पूछें के भला खाल क्या चीज़ है तो जितने मुंह उतनी बातें वाला मुहावरा सार्थक हो जाता है. खाल मेरे ख़याल से हिंदी में प्रयोग में लाने वाले शब्द दर्रा का ही पर्यायवाची है यानी दो पहाड़ों के बीच से निकलने का रास्ता. बडोलगाँव भूगोलीय परिदृश्य में भी एक खाल है, चंडाखाल.  कई वर्ष क़बल जब मोटरों द्वारा आवाजाही का चलन न था लोगबाग पैदल ही सफ़र करते थे और जो कमज़ोर अथवा अपाहिज थे वे टट्टू पर सवारी कर काम चलाते थे. दुगड्डा उस वक़्त एक बड़ा व्यापार का केंद्र था. कहते हैं रोज़ाना पचास टट्टू साज़ो सामान से लैस  हर सू निकल पड़ते थे दूर दराज़ के इलाक़ों की ज़रूरत की आपूर्ति करते थे. उस वक़्त दूगड्डा की चहल पहल  देखते ही बनती थी. चंडाखाल भी दुगड्डा से बडोल गाँव आने जाने का सुलभ मार्ग मुहय्या करता था. 
                  जैसा के पहले भी अर्ज़ कर चूका हूँ चंडाखाल की ऊंचाई पर कभी हमारी दुकान हुआ करती थी. मान्यवर दिवाकर के अनुसार किस जजमान ने के. डी. साहब को दक्षिणा स्वरुप अर्पित की थी. वह दूकान तो अब एक अरसे से नहीं है, अब वह रास्ता भी कम ही इस्तेमाल में आता है. एक बार का वाक़िया मुझे याद है, मैं, सर प्रभाकर, आनंद, मीनाक्षी और लक्ष्मी चंडाखाल हो कर बडोल गाँव आ रहे थे. चंडाखाल की चढ़ाई पर अच्छाखासा जंगल है. हम हँसते खेलते जंगल पार कर गाँव पहुँच गए, इस बात से क़तई बेख़बर के जंगल में रीछ हैं. अगर इस बात का ज़रा भी इल्म होता तो यक़ीनन निक्कर में अगर टट्टी नहीं तो पेशाब ज़रूर निकल आता. उस रात कुत्ता रात भर भोंकता रहा सुबह ताई जी ने बताया के भालू आया था. बाहर हर तरफ उसके उत्पात के निशान मौज़ूद थे -- सब्जियों के पौधे उखाड़े हुवे, आधे कद्दू खा कर फेंके हुए वैगैरह. गाँव में घर में शौचालय का चलन  नहीं था लिहाज़ा आज़ाद हो किसी भी अनुकूल जगह पर आप  संडास कर सकते थे. उस रोज़ मैंने कूल के आगे जा कर एक एकांत जगह चुनी और ज़मीन पर उकडूं बैठ हगने लगा. अचानक ही लगा के बिच्छु ने पूठी में डंक मार दिया हो. 
"मुर्दा मरल त्यार!' कह मैं उठ खड़ा हुआ, बिच्छु कहीं नहीं था हाँ कंडाली ज़रूर थी........

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