कुछ भी तो ठीक नहीं है । मंदिर अपने आप में महज़ अर्चना-पूजा का स्थल नहीं है वह तो हमारी आध्यात्मिक ज़रूरत को पूरा करने का जरिया है। वास्तव में मंदिर वास्तु कला का अद्भुद नमूना होता है। उसका एक क्लासिकल खाका होता है ,मसलन वह उस परिदृश्य का सबसे अहम् हिस्सा हो जहां उसे बनाया गया है, बनावट चौकोर , षट्भुज अथवा अष्टभुज पैमाने पर हो , सामने नृत्यशाळा हो , दिशा इस प्रकार से हो के सूर्य की प्रथम किरण अग्रभाग को चीर कर सीधे स्थापित मूर्ति पर पड़े । गुम्बद डिजाईन के भी इसी प्रकार दिशानिर्देश हैं। इस दृष्टि से तो गाँव का मंदिर पूर्ण रूप से असफल प्रयास है।
मेरी अपनी राय में मंदिर दरअसल हमारी सौन्दर्यबोध की परिणिति है , कल्पना की वह उड़ान जो किसी भी इमारत की 'functional' ज़रूरतों से आज़ाद है, सिर्फ ऐसा एहसास जो हमारी आध्यात्मिक अनुभूति को अपनी चरम सीमा पर ले जाता हो! मिटटी और पत्थर को जोड़ कर कोई भी इमारत खड़ी कर दी जाए और उसमें मूर्ति स्तापित कर दी जाये यह तो हमारी सौन्दर्यबोध कल्पना का भद्दा मजाक है ।
अब आप अपने गाँव के मंदिर पर नज़र डालें और बताएं के उस नैसार्गिक भूद्र्श्य पर इस भद्दे मजाक की क्या ज़रूरत थी?
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