शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

दरख़्त और देवता !


मेरे ख्याल से एक दरख़्त देवताओं को पूजने का बेहतर तरीक़ा है बजाये पत्थर की मूर्ति के। पहली बात तो दरख्त चेतन है पत्थर की तरह जड़ नहीं। दूसरी बात - रूह का एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश करना हमारी पौराणिक कथाओं का आम हिस्सा है। इस लिहाज़ से देखा जाय तो दरख्त की पूजा से हमें बेहतर सुकून की गुंजाइश रहती है।वैसे भी बेजान मूर्ति और वह भी किसी claustrophobic मंदिर में हमारी आध्यात्मिक ज़रूरत को  क़तई पूरा नहीं कर सकती है । 
          ग्राम देवता सिद्ध बाबा का बडोल गाँव में कोई मंदिर नहीं है। चंडाखाल के ढलान पर मौजूद घरों के पीछे एक (शायद) पीपल का दरख्त है। आसानी से दिखने वाला और सूर्य की रौशनी में अपने हरेभरे पत्तों से आच्छादित इस दरख़्त के तने पर तरह तरह के रंगीन धागे बंधे हैं। हर धागा किसी  की दिली मुराद का मुजाहिरा है । यहाँ के बाशिंदे इस दरख़्त पर धूप बत्ती जला कर सिद्ध बाबा की आराधना करते हैं। आस्था से भला कौन जिरह कर सकता है? 
मुझे सिर्फ हैरत इस बात की है के सिद्ध बाबा नाम से ऐसा जान पड़ता है मानो किसी सूफी पीर की इबादत होती है.


महज़ मेरा ख़याल............

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