मंगलवार, 3 जुलाई 2012

चरक की डांड


चरक की डांड,  चंडा-खाल की तरह बडोल गाँव स्थित पर्वत श्रंखला पर मौजूद एक उतंग शिखर है। अगर हिम्मत की जाए और मेहनत से इस शिखर पर चढ़ने का प्रयास करें  तो वहां से एक अद्भुद दृश्य देखने को मिलेगा। हिमालय की हिमाच्छादित श्रृखला का नज़ारा वहां से आसानी से सुलभ है। यूँ तो लोकगीत 'बेडू पाको बारा मासा ....' में 'का-फल' का ज़िक्र आता है, बताते हैं के 'का-फल' चैत्र में पकता है लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है. अलग अलग स्थान पर 'का-फल' अलग अलग वक़्त पकता  है और इस वक़्त 'का-फल' चरक की डांड पर अच्छी तरह पका हुआ मिलेगा।

       सरकारी नीतिया यूँ तो जनता की भलाई के लिए बनायीं जाती हैं लेकिन ज़मीनी सचाई से ना-वाक़िफ अफसरान इस बात से बेख़बर रहते हैं के कोई भी नीति हर भू-भाग, हर समय चक्र और हर संस्कृति के सर्वथा अनुकूल नहीं हो सकती, लिहाज़ा अक्सर इन नीतियों के दुष्प्रभाव जल्दी ही नज़र आने लगते हैं। कभी कभी नीतियाँ किसी नज़दीकी और गहन समाया से जूझने के लिया बनायीं जाती मगर 'over reach' का शिकार हो जाती हैं। अब शिकार पर पूर्ण पाबंदी को ही लीजिये, एक तरह से ठीक ही है के बाघ घोर संकट की घडी से गुज़र रहा है और उस के शिकार पर पूर्ण पाबंदी हो लेकिन जंगली सूवर पर शिकार की पाबंदी भला क्यूँ?


गाँव वाले अब खेती नहीं करते, एक तो पानी की समस्या है, खैर ये तो गर्मी भर की बात है लेकिन साल के अन्य वक़्त भी खेती करना फायेदे का सौदा नहीं है।वजेह? सूवारों का उत्पात। अब अगर आप खेती करना चाहते हैं तो आप को खेत के चर्रों तरफ ऊंची और मजबूत बाड़ लगनी होगी, किसमे इतनी कूव्वत है भला!









मल्या गाँव का एक खेत, 'मुंगरी' उगाई जा रही है।  सूअर से बचने के लिए खेत में लगाई बाड साफ़ दिखाई पड़ रही है। मल्या गाँव में पानी समस्या नहीं है।



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