कल दिन के वक़्त सो रहा था के एक स्वप्न देख कर यकायक जाग उठा. स्वप्न विचित्र था, अद्भुद था. बलके यूँ कहें सनसनीखेज़ और मानीखेज़ था. एक राज़गार कथानक का आग़ाज़ था. स्वप्न का परिद्रश्य बडोल गाँव था, किसी घर में, शायद डांड वाले घर का कोई बड़ा कमरा; कई लोग बैठे गुफ्तगू में मशगुल थे के अचानक ही एक रहस्यमय शख्स कमरे में दाख़िल हुआ और अपनी ज़ेब से ताश की गड्डी निकाल कर कमरे में मौजूद सभी अफराद को एक एक पत्ता देने लगा. शख्स के चेहरे पर कोई भाव नहीं था न तो वह दोस्त नज़र आता था न ही दुश्मन. हैरत की बात यह थी की किसी ने भी उस शख्स का प्रतिवाद नहीं किया चुपचाप बांटे गए ताश के पत्ते को ग्रहण कर लिया. शायद उस आदमी की शख्सियत ही ऐसी तेजतर्रार और अर्थपूर्ण थी के वहाँ बैठे लोगों का ज़ोर उसकी ओर से होने वाली रहस्यमय हरकत पर थी. वे सभी उसके अगले क़दम का बेशब्री से इंतज़ार कर रहे थे.
ताश के पत्ते देखने में ज़रूर ताश जैसे ही थे लेकिन उन पत्तों में कुछ और ही था. हर पत्ते पर एक साधारण सा दिखने वाला स्केच था, यानी किसी के पत्ते पर कुर्सी का स्केच था तो किस्सी और के पत्ते पर छूरी दर्ज थी. कुल मिला कर सभी बन्दों को कुछ जुदा जुदा तश्वीरें मिली. फिर अचानक ही वह शख्स सभी लोगों पर एक अर्थपूर्ण द्रष्टि डाल कर वहाँ से चला गया..........
अभी बाक़ी है.....
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